देवउठनी एकादशी व्रत कथा एवं पूजा विधि..!

देवउठनी एकादशी, हिन्दू एकादशियों में से सबसे महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने बाद अपने निद्राकाल से बाहर आते हैं।  यह दिन बहुत शुभ होता है और इसी दिन बेहद प्रबल योग बनते हैं। इस दिन किसी भी कार्य का परिणाम सफल ही रहता है। हिन्दू मान्यताओं में देवउठनी एकादशी के दिन ही अधिकतर लोग शादी-ब्याह जैसे मंगल कार्यों को करते हैं। अगर किसी की लंबे समय शादी का कोई शुभ मुहूर्त ना निकल रहा हो, तो देवउठनी एकादशी का दिन सबसे उत्तम रहता है।

देवउठनी एकादशी से सम्बंधित बहुत सारी कथाएं है।

1) एक कथा शंखासुर नामक राक्षस की है। शंखासुर ने तीनों लोको में बहुत ही उत्पात मचाया हुआ था। सभी देवतायों के आग्रह करने पर उन्होंने भगवान विष्णु ने उस राक्षस से युद्ध किया और यह युद्ध कई वर्षो तक चला। युद्ध में वह असुर मारा गया और इसके बाद भगवान विष्णु विश्राम करने चले गए। कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान् विष्णु की निद्रा टूटी थी और सभी देवतायों ने भगवान विष्णु की पूजा की थी।

2) एक और प्रचलित कथा एक राजा की है। प्राचीन समय में एक राजा था जिसके राज्य में सभी लोग नियमित रूप से एकादशी का व्रत किया करते थे। एक दिन एक दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा का पास काम मांगने आया। राजा ने उसे काम पर इस शर्त पर रखा की एकादशी के दिन उसे खाने के लिए कुछ नहीं मिलेगा। उस समय तो उस व्यक्ति ने यह शर्त मान ली, लेकिन बाद में उसने एकादशी के दिन राजा से कुछ खाने को माँगा। राजा ने पहले तो उसे माना कर दिया, लेकिन बाद में दया दिखाकर और उसका काम देखते हुए राजा ने उस व्यक्ति को कुछ खाने को दे दिया।।!

अन्न मिल जाने के बाद वह नदी किनारे स्नान करने गया, उसके बाद उसने भोजन बनाया और भगवान को भोजन ग्रहण करने का निमंत्रण दिया भगवान उसके निमंत्रण पर आए और प्रेम के साथ भोजन ग्रहण किया और फिर अंतर्ध्यान हो गए। अगली एकादशी को वह फिर राजा के पास गया और दुगुना अन्न माँगा। राजा के कारण पूछने पर उसने कहा की भगवन भी मेरे साथ भोजन करते है और इतना भोजन हमारे लिए पर्याप्त नहीं है।

राजा को उसकी बात पर बिलकुल विश्वास नहीं हुआ और उसने कहा की वह एकादशी पर इतनी व्रत और पूजा करते है लेकिन भगवान ने तो उन्हें कभी दर्शन नहीं दिए। उस व्यक्ति ने कहा की वह खुद चलकर देख ले। राजा उसके साथ गए और एक पेड़ के पीछे छुप गए। उस व्यक्ति ने हर बार की तरह भगवान को बुलाया लेकिन भगवान नहीं आए। उस व्यक्ति ने उसके बाद भगवान् को गुहार लगाईं की अगर आप नहीं आए तो मैं इसी नदी में कूदकर जान दे दूंगा। उस व्यक्ति का द्रिड निश्चय देखते हुए भगवान वह आए और हर बार की तरह उसके साथ भोजन किया।

राजा ने यह सब देखा और सोचा की सिर्फ व्रत रखने से भगवान की प्राप्ति नहीं होती, मन की शुद्धि भी जरूरी है। अगली बार उसने पुरे मन और श्रद्धा के साथ भगवान की उपासना की और स्वर्ग सिधारे।   

इस दिन प्रातः स्नान करकर भगवन विष्णु और माँ लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। विष्णु जी को तुलसी का पत्ता भी चढ़ाना चाहिए। जिनका व्रत है, उनको स्वयं पत्ता नहीं तोडना चाहिए।।! इस दिन विष्णु सहस्रनाम का जप करना चाहिए और पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन भी करवाना चाहिए। ऐसा करने से विष्णु जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी पापों से मुक्ति मिलती है।


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