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गणेश चतुर्थी व्रत कथा: भगवान गणेश की अनोखी जन्म कहानी..!

गणेश चतुर्थी भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है जिसे 10 दिनों तक भगवान गणेश जी के जन्मोउत्सव के रूप में बेहद उत्साह और धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार को गणेशोत्सव या विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। इस पर्व के दौरान भगवान गणेश के भक्त अपने घरों में उनकी मूर्ति की स्थापना करते हैं और 10 दिन बाद उस मूर्ति को विसर्जित करते हैं।

गणेश चतुर्थी के पर्व के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी प्रचलित है। एक बार माँ पार्वती स्नान के लिए जा रही थी. स्नान करते समय कोई भीतर न आ जाये इसके लिए उन्होंने अपनी माया से एक बालक को जन्म दिया और उसका नाम गणेश रखा। स्नान के लिए जाने से पूर्व उन्होंने गणेश जी को कहा की वह सनान करने भीतर जा रही है, अतः किसी को भी अन्दर न आने दे। कुछ देर पश्चात् भगवन शिव वहा आये और गणेश जी ने उन्हें अन्दर जाने से रोका। यह सुन्कर भगवान शिव क्रोधित हो गये और दोनों में युद्ध शुरू हो गया। बालक गणेश को रस्ते से हटाने के लिए और दंड देने के लिए भगवन शिव ने उनका सर धड से अलग कर दिया।

 

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जब इस बारे में माँ पार्वती को पता चला तो उन्हें बहुत ही आघात पंहुचा। उन्होंने अपना क्रोध और विलाप भगवन शिव से समक्ष प्रस्तुत किया और कहा की उनके पुत्र को जीवित किया जाये नहीं तो वह भी अपने प्राण त्याग देंगी। माँ पार्वती का ऐसा रूप देखकर भगवान शंकर ने अपने गणों को आदेश दिया की वह सबसे पहले दिखने वाले किसी ऐसे बालक का सर लेके आये जिसकी माँ उसकी तरफ पीठ करकर सोई हो। बहुत ढूढने पर उन्हें एक हाथी दिखाई दिया जिसकी माता उसकी तरफ पीठ करकर सोई हुई थी। शिव गण उस हाथी का मस्तक ले आये और वह मस्तक शिव ने गणेश जी के धड से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित किया।

भगवान शिव ने इसके बाद उन्हें सभी गणों का स्वामी होने का आशीर्वाद दिया जिससे उनका नाम गणपति पड़ा। माँ पार्वती और भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कोई भी शुभ कार्य होने से पहले उनकी पूजा की जाएगी, तभी वह कार्य सफल होगा।

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मान्यता यह है की यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी इसीलिए यह तिथि गणेश चतुर्थी पर्व के रूप में मनाई जाती है। आगे चलकर बाल गंद्गाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक महौत्सव का स्वरुप दिया जिससे यह उत्सव राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया।


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