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हरतालिका तीज: माँ पार्वती के निष्काम प्रेम एवं भक्ति की कहानी...!

हरतालिका तीज भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह व्रत भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीय के दिन किया जाता है। इस दिन सभी कुआरी और विवाहित महिलाएं, गौरी-शंकर का विधि-विधान से पूजन और व्रत करती है। ऐसा माना जाता है की हरतालिका तीज का व्रत करने से एक अच्छे पति की कामना पूर्ण होती है और पति की आयु बढ़ती है। माँ गौरी ने भी यह व्रत, भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए किया था।

माँ गौरी ने, सती के जन्म के बाद, पर्वतराज हिमालय के घर में पार्वती के रूप में जन्म लिया। माँ पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को पति के रूप में चाहती थी। इस कामना की पूर्ती के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। बारह वर्षो तक माँ पार्वती ने निराहार पत्तों को खाकर व्रत किया। उनकी इस अवस्था को देखकर उनके पिता को बहुत ही दुःख हुआ।

इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद, भगवान विष्णु जी का विवाह प्रस्ताव लेकर माँ पारवती के पिता के पास पहुंचे। उनके पिता इस प्रस्ताव से बहुत ही खुश हुए और उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

जब पार्वती को इस बात का पता चला तब वह बहुत दुखी हुई और अपनी यह व्यथा सखी को बताई। यह सब सुनने पर उनकी सखी पार्वती को लेकर वन में चली गई जहा पर माँ पार्वती ने शिवजी की घोर तपस्या की। उनकी तपस्या से भगवान शिव बहुत प्रसन हुए और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।

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उसी दौरान पर्वतराज हिमालय ने पार्वती को बहुत खोजा पर वह ना मिली। बहुत ढूढने के बाद जब माँ पार्वती मिली तो उनके पिता ने उनसे इस तपस्या का कारण पुछा। पार्वती ने सब बात अपने पिता के समक्ष रखी। अपने पुत्री के हठ और शिव के प्रति निष्काम प्रेम को देखते हुए उन्होंने उनका विवाह भगवान् शिव से तय कर दिया।

तबसे यह मान्यता है की जो कन्या या स्त्री इस दिन इस व्रत को विधि-विधान और संपूर्ण निष्ठा से करती है उन्हें मनोवांछित वर प्राप्त होता है। साथ ही साथ यह व्रत पति की आयु बढ़ाता और दांपत्य जीवन में भी खुशहाली लाता है।


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